भगवती विंध्यवासिनी आद्या महाशक्ति हैं। विंध्याचलसदा से उनका निवास-स्थान रहा है। जगदम्बा की नित्य उपस्थिति ने विंध्यगिरिको जाग्रत शक्तिपीठ बना दिया है। महाभारत के विराट पर्व में धर्मराज युधिष्ठिर देवी की स्तुति करते हुए कहते हैं- विन्ध्येचैवनग-श्रेष्ठे तवस्थानंहि शाश्वतम्।हे माता! पर्वतों में श्रेष्ठ विंध्याचलपर आप सदैव विराजमान रहती हैं। पद्मपुराणमें विंध्याचल-निवासिनीइन महाशक्ति को विंध्यवासिनी के नाम से संबंधित किया गया है- विन्ध्येविन्ध्याधिवासिनी।
श्रीमद्देवीभागवतके दशम स्कन्ध में कथा आती है, सृष्टिकत्र्ता ब्रह्माजीने जब सबसे पहले अपने मन से स्वायम्भुवमनु और शतरूपाको उत्पन्न किया। तब विवाह करने के उपरान्त स्वायम्भुवमनु ने अपने हाथों से देवी की मूर्ति बनाकर सौ वर्षो तक कठोर तप किया। उनकी तपस्या से संतुष्ट होकर भगवती ने उन्हें निष्कण्टक राज्य, वंश-वृद्धि एवं परम पद पाने का आशीर्वाद दिया। वर देने के बाद महादेवी विंध्याचलपर्वत पर चली गई। इससे यह स्पष्ट होता है कि सृष्टि के प्रारंभ से ही विंध्यवासिनी की पूजा होती रही है। सृष्टि का विस्तार उनके ही शुभाशीषसे हुआ।
त्रेतायुगमें भगवान श्रीरामचन्द्र सीताजीके साथ विंध्याचलआए थे। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम द्वारा स्थापित रामेश्वर महादेव से इस शक्तिपीठ की माहात्म्य और बढ गया है। द्वापरयुगमें मथुरा के राजा कंस ने जब अपने बहन-बहनोई देवकी-वसुदेव को कारागार में डाल दिया और वह उनकी सन्तानों का वध करने लगा। तब वसुदेवजीके कुल-पुरोहित गर्ग ऋषि ने कंस के वध एवं श्रीकृष्णावतारहेतु विंध्याचलमें लक्षचण्डीका अनुष्ठान करके देवी को प्रसन्न किया। जिसके फलस्वरूप वे नन्दरायजीके यहाँ अवतरित हुई।
मार्कण्डेयपुराणके अन्तर्गत वर्णित दुर्गासप्तशती(देवी-माहात्म्य) के ग्यारहवें अध्याय में देवताओं के अनुरोध पर भगवती उन्हें आश्वस्त करते हुए कहती हैं, देवताओं वैवस्वतमन्वन्तर के अट्ठाइसवेंयुग में शुम्भऔर निशुम्भनाम के दो महादैत्यउत्पन्न होंगे। तब मैं नन्दगोपके घर में उनकी पत्नी यशोदा के गर्भ से अवतीर्ण हो विन्ध्याचल में जाकर रहूँगी और उक्त दोनों असुरों का नाश करूँगी।
लक्ष्मीतन्त्र नामक ग्रन्थ में भी देवी का यह उपर्युक्त वचन शब्दश:मिलता है। ब्रज में नन्द गोप के यहाँ उत्पन्न महालक्ष्मीकी अंश-भूता कन्या को नन्दा नाम दिया गया। मूर्तिरहस्य में ऋषि कहते हैं- नन्दा नाम की नन्द के यहाँ उत्पन्न होने वाली देवी की यदि भक्तिपूर्वकस्तुति और पूजा की जाए तो वे तीनों लोकों को उपासक के आधीन कर देती हैं।
श्रीमद्भागवत महापुराणके श्रीकृष्ण-जन्माख्यान में यह वर्णित है कि देवकी के आठवें गर्भ से आविर्भूत श्रीकृष्ण को वसुदेवजीने कंस के भय से रातोंरात यमुनाजीके पार गोकुल में नन्दजीके घर पहुँचा दिया तथा वहाँ यशोदा के गर्भ से पुत्री के रूप में जन्मीं भगवान की शक्ति योगमाया को चुपचाप वे मथुरा ले आए। आठवीं संतान के जन्म का समाचार सुन कर कंस कारागार में पहुँचा। उसने उस नवजात कन्या को पत्थर पर जैसे ही पटक कर मारना चाहा, वैसे ही वह कन्या कंस के हाथों से छूटकर आकाश में पहुँच गई और उसने अपना दिव्य स्वरूप प्रदर्शित किया। कंस के वध की भविष्यवाणी करके भगवती विन्ध्याचल वापस लौट गई।
मन्त्रशास्त्रके सुप्रसिद्ध ग्रंथ शारदातिलक में विंध्यवासिनी का वनदुर्गा के नाम से यह ध्यान बताया गया है-
सौवर्णाम्बुजमध्यगांत्रिनयनांसौदामिनीसन्निभां चक्रंशंखवराभयानिदधतीमिन्दो:कलां बिभ्रतीम्। ग्रैवेयाङ्गदहार-कुण्डल-धरामारवण्ड-लाद्यै:स्तुतां ध्यायेद्विन्ध्यनिवासिनींशशिमुखीं पार्श्वस्थपञ्चाननाम्॥
जो देवी स्वर्ण-कमल के आसन पर विराजमान हैं, तीन नेत्रों वाली हैं, विद्युत के सदृश कान्ति वाली हैं, चार भुजाओं में शंख, चक्र, वर और अभय मुद्रा धारण किए हुए हैं, मस्तक पर सोलह कलाओं से परिपूर्ण चन्द्र सुशोभित है, गले में सुन्दर हार, बांहों में बाजूबन्द, कानों में कुण्डल धारण किए इन देवी की इन्द्रादिसभी देवता स्तुति करते हैं। विंध्याचलपर निवास करने वाली, चंद्रमा के समान सुंदर मुखवालीइन विंध्यवासिनी के समीप सदाशिवविराजितहैं।
सम्भवत:पूर्वकाल में विंध्य-क्षेत्रमें घना जंगल होने के कारण ही भगवती विन्ध्यवासिनीका वनदुर्गा नाम पडा। वन को संस्कृत में अरण्य कहा जाता है। इसी कारण ज्येष्ठ मास के शुक्लपक्ष की षष्ठी विंध्यवासिनी-महापूजा की पावन तिथि होने से अरण्यषष्ठी के नाम से विख्यात हो गई है।
Comments
ajit - Oct 2, 2011
JAI HO MAA VINDHYAVASINI JI
sanjay - Mar 12, 2012
JAI MATA DI, JAI MATA DI, JAI MATA DI
shashank singh - Mar 23, 2012
JAY MATA DI
Omkar Nath Tripathi - Apr 9, 2012
JAI MATA DI
ajit - May 19, 2012
YESTERDAY I HAVE VISITED THE THREE TEMPLES MAA VINDHYAVASINI JI, MAA ASHTBHUJA DEVI, MAA KALIKHOH. I FEEL BLESSED.
HE MAA SHOW YOUR BLESSINGS ON ME AND MY CHILDREN.
dheeraj dubey - Jul 11, 2012
NAE
dheeraj dubey - Jul 11, 2012
JAI MATA DI
Anand S Chourasiya - Jul 13, 2012
Maa ke SHREE CHARNO MAI DANDWAT PRANAM..........
sanjay sanjaymaurya - Jul 25, 2012
ma ki jai ho
sanjay sanjaymaurya - Aug 6, 2012
maiya ki jai ho
Jigar Bhatt - Aug 28, 2012
Thank you for such a wonderful article on Glory of Shri Vindhyavasini Ma! Jai Ma Vindhyavasini!
RAVI KUMAR BHAGAT - Aug 31, 2012
JAI MATA KI
sanjay sanjaymaurya - Sep 7, 2012
jai shri ma
OM Shankar - Sep 30, 2012
OM namo vindhyvasni namha
Jai kara ma vindhyvasni ka....
mahindra kumar sharma - Oct 11, 2012
doston aap se koi bhe apraadh ho jaye sacche man se maa ke samne pachatap kar lo wo abhya karengi
MANOJ KUMAR TIWARI - Oct 16, 2012
jai mata di
jai jai jai
maa vindhyawasini teri sada hi jai ho
shashi mishra - Oct 22, 2012
JAI MATA DI
Arun Kumar - Oct 23, 2012
Jai Maata Di
santosh mishra - Nov 16, 2012
JAI MATA DI MA KI MAHIMA APAR HAI HYE VIDHYAWASHINI MA AP JAGAT AUR APNE BHAKTO PAR APNI KRIPA BANAYE RAKHIYE
Anand Pathak - Feb 25, 2013
JAI HO MAA JAGATJANANI KI MAA MERE SARE KAST KO DUR KARO SARA SANSAR KO KHUSH RAKHNA MAA IS DHARTI PAR KOI DHUKHI NA HO
JAI MAA VINDHYAVASINI
rishabh yadav - Apr 11, 2013
Jai maa vindhyavashini
Alok Kumar ojha - Apr 26, 2013
Jai, jai maa vindyavasine. Prem se bolo "JAI MAA VINDYAVASINE"$$$$$$$$$$$$$$$!!!!!!
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sonam mishra - Sep 11, 2011
sahi baat mata ki mahima aprampar hai jo mata ki sharan me jata hai uska kalyan ho jata hai.
Ek baar bolo maa vindhyavasini ki jai